Saturday, August 2, 2014

गजल
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दावत खतम हुई तो अपने घर चले गए।
अच्छे दिनों के साथ हमसफर चले गए।।

ठोकर लगी तो टूट कर बिखर गए तिलस्म।
खुशफहमियों के साथ कई डर चले गए।।




Thursday, August 9, 2012

मां
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जब भी याद किया पास आकर खड़ी हो गयी मां
जिसको भी देखा इज्जत से, वही हो गयी मां
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दिन भर से आंखें सूनी थीं, बुझा हुआ था मन
मुझको घर आते  देखा तो अच्छी हो गयी मां

नाजुक हाथों ने जब कसकर पकड़े मेरे हाथ
पा लेने  की जिद करती सी  बच्ची हो गयी मां

आंखों में है वही इबारत लेकिन धुंधली सी
कागज पर स्याही से लिक्खी चिट्ठी हो गयी मां

आंखों में सपने हैं लेकिन थके हुए हैं  पांव
टूटे फूटे पंखों वाली तितली हो गयी मां
भीड़ बहुत है लेकिन आँखें अपनों को ढूंढें 
मेले में खोयी छोटी सी बच्ची हो गयी मां

- निकष परमार


गजल
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इतने बरस रहा यहां जड़ें नहीं जमा सका
मैं शहर की जमीन से रिश्ता नहीं बना सका

मिट्टी अलग थी गांव की, मौसम भी कुछ जुदा ही था
जो आबो हवा खो गई वो मैं यहाँ न पा सका

किसम किसम की खुशबुएं पुकारती रहीं मुझे
मैं बैठकर सुकून से दो रोटियां न खा सका

रूठे हैं वो कि मैंने उन्हें याद क्यूं नहीं किया
वो जिनको एक पल को मैं दिल से नहीं भुला सका


- निकष परमार

Friday, July 13, 2012

मां

कल मां के पास बैठा तो उसने कसकर हाथ पकड़ लिए।

उसे अच्छा लग रहा था। वह इन क्षणों को जी लेना चाहती थी। और उन्हें जाने नहीं देना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि मैं जाऊं। उसे मेरी जरूरत महसूस हो रही थी। वह भीतर से बहुत असहाय लग रही थी। मैं फिर आऊंगा बोलकर निकल आया।

पापाजी को भी यही बोलकर निकला था। वे चाहते थे कि मैं उनके कुछ दोस्तों के आने तक रुकूं और सबकी ग्रुप फोटो खींच दूं। दफ्तर का टाइम हो रहा था। मुझे रायपुर के लिए बस पकडऩी थी। सो रुक नहीं सका। फिर उनके जाने के बाद ही धमतरी जाना हुआ।

कुछ रोज पहले मप्र के अपने एक दोस्त से बात हो रही थी। वे मेरे गंभीर दोस्तों में से हैं। हर बार मां का हाल पूछते हैं। मैंने बताया कि मां बहुत कमजोर हो गयी हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मां के संस्मरण टेप कर लिए जाएं। कुछ अच्छे सवालों के साथ बात की जाए। मेरा भी यही खयाल है। वे तरह तरह के लोगों से बात करते हैं और उनकी सांस्कृतिक विविधताओं का डाक्युमेंटेशन करते हैं। उन्होंने अपने हिसाब से सुझाव दिया। और सही सुझाव दिया।

मां की स्मरण शक्ति कमजोर होती जा रही है। मां के जाने से  पापाजी के निजी जीवन के बारे में बताने वाला सबसे प्रमुख स्रोत चला जाएगा। जैसे आदरणीय त्रिभुवन पांडेय के चले जाने के बाद पापाजी के कृतित्व को सबसे करीब से जानने वाला नहीं रहेगा। किसी के जाने की कल्पना करना अच्छी बात नहीं है लेकिन जाना तो सबको है। बुजुर्गों के बारे में यह चिंता तो लगी रहती है।

कल बहन ने बताया कि मां को एक बार उसके जन्मस्थान ले जाना चाहती थी। क्योंकि मां बार बार ऐसी इच्छा प्रकट करती रहती थी। यह इच्छा पूरी नहीं हो पायी। बहन ने पापाजी को भी उन जगहों पर ले जाने की सोची थी जिनका जिक्र वह करते रहते थे।

मां का कसकर हाथ पकडऩा व्यथित कर रहा है। यह उल्टी यात्रा का संकेत है। अब मां बच्ची जैसी हो गयी।

अभी भगवान से प्रार्थना करने का समय नहीं आया है। यह समय हम लोगों के कुछ करने का है।



Wednesday, July 11, 2012

अदृश्य दुनिया ---------------



आंखें बंद कर लेने से
अदृश्य हो जाती है
सामने खड़ी दुनिया

आंखें बंद करके आप नहीं देख सकते
वह सब जो सारी दुनिया देख रही है

मसलन
रात को दिन में बदलने के लिए  उगता हुआ सूरज
घर बनाने के लिए तिनके जमा करती हुई चिड़िया 
और ठंडे  मौसम में चाय की पतीली से उठती हुई भाप

आँखें बंद करके आप नहीं देख सकते
सुबह सुबह तैयार होकर स्कूल जाते हुए बच्चे
अपने घर का काम निबटाकर
बाहर के काम पर जाती फुर्तीली कामवालियां
और रोजी रोटी  की तलाश में शहर आने वाले मजदूर

आंखें बंद करके नहीं देखे जा सकते
किसी बेबस की आंखों में भर आए आंसू
किसी परेशान  इंसान के माथे पर उभर आया पसीना
और किसी घायल  के जख्मों से रिसता हुआ खून


आंखें बंद कर लेने से
जब कुछ भी नहीं दिखेगा
अपने रचे स्वप्नलोक के सिवाय

तो फिर संपादक को
मैं क्या दिखूंगा
और क्या तो दिखेगा मेरा काम।

Monday, April 16, 2012

मां क्या चाहती है -------------

मां चाहती है अब जी भर कर आराम करना
जीवन भर काम करने के बाद
ये उसका हक भी बनता है
और उम्र को देखते हुए
यह उसकी जरूरत भी है।

मां चाहती है कि उसकी सेहत अच्छी रहे
वह उठती है तो चक्कर आते हैं
लेटती है तो सर दुखता है
कभी खाने की इच्छा नहीं होती
कभी खाकर भी अच्छा नहीं लगता।

मां चाहती है कि बच्चे
उसका हालचाल पूछते रहें
और वह आश्वस्त रहे
कि वे उसके साथ हैं।

मां चाहती है कि उसके सामने रहें
अच्छे दिनों की तस्वीरें
पापाजी की किताबें
और मायके से लायी गयी अलमारी

मां चाहती है
उन अभावों को छिपाए रखना
जिन्हें बताने का अब कोई मतलब नहीं है।
वह चाहती है उन सवालों से बचना
जिनके उत्तर अब उसके पास नहीं हैं।


चाहती तो माँ और भी बहुत कुछ थी
जब हाथ  पाँव सलामत थे

 उसने भी बहुत से सपने देखे थे
जब सपने देखने के दिन थे

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Sunday, December 18, 2011

सुधीर

सुधीर मार्केट में आ चुका है। अब हमारे बोलने का समय खत्म हो गया। अब जो बोलना है, वही बोलेगा।

पिछले हफ्ते भर से वह छुट्टी पर था।


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वह बिहार से आया है। उसने मेरे सामने ही जॉइन किया था। तब वह पोस्ट ग्रैजुएशन के बाद पीएचडी के लिए कोशिश कर रहा था।

तब उसकी भाषा बहुत कमजोर थी। कई बार वह लिखना शुरू ही नहीं कर पाता था। कई बार वह समझ नहीं पाता था कि घटनाओं को किस नजरिए से देखे और उनके बारे में क्या लिखे। अपनी इस कमजोरी के लिए वह रोज डांट खाता था। कई बार यह डांट बहुत अपमानजनक होती थी। इसमें नौकरी से निकालने की धमकी भी शामिल होती थी। वह सिर झुकाकर सुनता रहता था। संपादक के चेम्बर से निकलता था तो चेहरा लाल हो चुका होता था। लोग उसे देखकर हमदर्दी से भर जाते थे। वह किसी सहमे हुए बछड़े की तरह इधर उधर देखता रहता था और मौका मिलते ही किसी वरिष्ठ सहयोगी के पास पहुंच जाता था- इसे कैसे बनाएंगे, जल्दी से बता दीजिए। बॉस गरम हो रहे हैं। उसकी नजरें संपादक के कमरे की ओर लगी रहती थीं। क्योंकि एक खबर के लिए डांट सिर्फ एक बार नहीं पड़ती थी।

यह समय उसके लिए बहुत कठिन था। उसकी उम्र के किसी भी लडक़े के लिए यह समय कठिन हो सकता था। हम लोग अचरज करते थे कि वह यह सब कैसे सह लेता है। हममें से ज्यादातर लोगों की राय थी कि इतना अपमान सहकर हम लोग यहां रुक नहीं पाते।

वह मुझसे अपना सुख दुख कहता था। उसकी बातों से पता चलता था कि उसकी बुद्धू सी सूरत के पीछे बहुत संवेदनशील और सुलझा हुआ इंसान था। उसने मुझे बताया कि उसे पीड़ा तो बहुत होती है लेकिन सीखने को भी तो मिलता है। वह कहता था- मैं यहां पढऩे के लिए आया हूं। मां बाप और मेरे शहर के लोगों को अच्छा लगता है कि मैं यहां काम कर रहा हूं। उन्हें लगता है कि मैं बड़ा आदमी बन गया हूं। मैं काम छोडक़र जा सकता हूं। लेकिन इससे बहुत सारे लोगों को दुख होगा। फिर मुझे क्या हासिल होगा। यही तो उम्र है दुनिया देखने और दुनियादारी सीखने की।

उसकी बातों में बहुत ज्ञान छिपा होता था। अनुभव से पाया गया ज्ञान। वह किताबी बातें नहीं करता था। बल्कि ऐसी बातें करना उसे आता ही नहीं था। वह जिंदगी को जीने में विश्वास रखता था। जिंदगी जिस रूप में मिले, उसे गले लगाने को तैयार।

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वह पिछले दो चार साल में बहुत बदला है। उसकी भाषा बहुत सुधर चुकी है। वह घटनाओं को अलग अलग तरह से देख और लिख सकता है। वह आत्मविश्वास से भर चुका है। अपने पेशे की संभावनाओं और चुनौतियों से वह वाकिफ है। मुझे उसमें एक बात अच्छी लगती है कि वह कभी आरामतलबी की बातें नहीं करता। वह जानता है कि जब तक सांस है, संघर्ष चलता रहेगा। यह शायद बिहार का ट्रेड मार्क है।

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उसमें बहुत कुछ ऐसा है जो मुझमें नहीं है। वह डरता नहीं लेकिन मौका देखकर झुकना भी जानता है। बुरा लगने पर भी चुप रहना जानता है। वह किसी दफ्तर में अंदर पहले जाता है, मे आई कम इन बाद में बोलता है। उसने मुझे बताया है कि भूख लगने पर पहले खा लेना चाहिए। जेब में पैसा है कि नहीं यह बाद में देखना चाहिए। पेट भरा रहेगा तो दिमाग कोई उपाय निकाल ही लेगा।

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वे तीन दोस्त एक जगह रहते हैं। मिलकर खाना बनाते हैं। रात में जब बिरादरी के लोग ढाबे जाने का इंतजाम करते रहते हैं, सुधीर और उसके दोस्तों के हाथ में मूली टमाटर देखना एक सुखद अनुभव है।

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वह अपनी मां का दुलारा है।

बीच में उसने अपना लुक बिगाड़ लिया था। बाल भूरे करवा लिए थे जो ऐसे खड़े रहते थे मानो उन्हें कलफ लगाकर सुखा दिया गया हो।

वह मुझसे इसकी तारीफ सुनना चाहता था। मैंने कह दिया कि वह बहुत बुरा दिख रहा है।

मेरी बातों का वह बुरा नहीं मानता। लेकिन उस रोज भावुक हो गया। उसने कहा- मेरी मां तो कहती है कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा हूँ



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वह बिहार को लेकर भी बहुत संवेदनशील है। अपने राज्य को लेकर किए गए मजाक को वह मजाक की तरह नहीं ले पाता। एक बार मुझ पर भी नाराज हो चुका है। वह खुद को अपने राज्य का ब्रांड एंबेसेडर समझता है। वह मेरे लिए घर से सत्तू लेकर आया था। लिट्टी चोखा खिलाने का उसने वादा किया है। छठपूजा का वर्णन वह बहुत उत्साह से करता है।

उसका जुड़ाव झारखंड से भी है जहां उसके पिता काम करते हैं। वह महेंद्र सिंह धोनी के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहता। उसे छेडऩे का आसान तरीका है कि धोनी के खिलाफ कुछ बोलना शुरू कर दो।

वह कॉलेज के जमाने का क्रिकेटर भी है।


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दुनियादारी के बारे में सुधीर की बातें सुनना बहुत अच्छा लगता है। वह साफ साफ बात करता है। एक युवा हृदय के सभी तरह के द्वंद्व उसके भीतर चलते रहते हैं। लेकिन वह उनसे अप्रभावित दिखना जानता है। अनेक अवसरों पर उसकी उपस्थिति आपको संबल देती है।


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आपको कभी कभी वह मतलबी और चालाक लग सकता है। लेकिन जीवन के इस महाभारत में हर अस्त्र शस्त्र की आवश्यकता पड़ती है। नियम टूटते हैं और मर्यादाएं भंग होती रहती हैं। घर से सैकड़ों मील दूर जीवन का संघर्ष कर रहा एक बालक इससे अलग कैसे रह सकता है?

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सुधीर मुझे चक्रव्यूह में दाखिल हो चुके अभिमन्यु जैसा लगता है। लेकिन उसकी नियति अभिमन्यु जैसी नहीं है। सुधीर और उसकी पीढ़ी की कहानी महाभारत के आगे की कहानी है।